Poetry: कुछ मजबूर होकर.....!
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कुछ मजबूर होकर.....!
सुनो दुनियावालों.....!
सच वही....जो जी रहा हूँ....
मैं....यहाँ आज-कल...
इसमे निष्कर्ष हैं वे सभी....!
जो अब तलक आये हैं निकल...
प्यारे...पढ़ाई थी मैंने गिनतियाँ...
जिन्हें नादान जानकर....
नियति का खेल तो देखो...
पहाड़ा पढ़ा रहे हैं वही मुझे,
नादान और बे-जान जानकर....
ऊँगली पकड़-पकड़ कर....!
जिन्हें चलना सिखाया था मैंने,
घर का नन्हा मेहमान मानकर ...
छड़ी पकड़ा दी है...उसी ने मुझे...
जल्द जाने वाला...मेहमान मानकर..
परिवर्तन भी क्या चीज है प्यारे....!
भजन और लोरियाँ सुनाया,
जिन्हें....उनका रोना देखकर....
सामने ही...गालियाँ दे रहे हैं वही...
मेरा....मजबूर होकर रोना देखकर...
खुश होकर....लोगों की भीड़ में भी..
ले गया....जिसे मैं जानबूझकर...!
खुशी कम न हो जाए उसकी
बस इसलिए प्यारे....!
कोने में डाल रखा है उसने....
बिस्तर मेरा....खुद जानबूझकर...
अब और क्या ही कहूँ मैं प्यारे.....!
निछावर किया था सब कुछ,
जिसकी हँसी एक पर....
अब तो लगता है....!
मस्त होकर हँसेगा वो...
मेरी मौत पर....
बन्धुओं...समेटी है मैंने इसमे...
उम्र भर की दास्ताँ....
वैसे जानते आप सभी हो इसे
कि...कहना मुनासिब नहीं है....
बहुत कुछ यहाँ.....!
पर....दुनिया का दस्तूर है प्यारे...
कितना ही सम्मान पाएं....
हम यहाँ मशहूर होकर....
धोखा खाते मिलेंगे....सदा ही यहाँ...
अपनों के ही हाथों....!
कुछ मज़बूर होकर....
कुछ मज़बूर होकर.....
रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ


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